Wednesday, October 26, 2011

25-Oct-2011


१.मैं अपने सभी दोस्तों की खूब help करता हूँ. पर time पे वो मेरी help कभी नहीं करते उलटे मेरा मज़ाक उड़ा देते हैं. क्या मुझे उनकी help करनी छोड़ देनी चाहिए? और, मुझे क्या करना चाहिए.
प्रीतम पार्कर, पटना

नेकी कर दरिया में डाल – गीता में इसे निष्काम कर्म कहा गया है. हेल्प करते समय हमें भीतर से अच्छा लगता है. जो खुशी हमें कुछ हासिल कर के मिलती है उससे कहीं ज्यादा खुशी दूसरों की हेल्प करने से मिलती है. तो हेल्प करना बिलकुल छोड़ना नहीं चाहिए. अपने हेल्प के दायरे को दोस्तों तक लिमिटेड नहीं रखते हुए आप ऐसे लोगों की मदद ज्यादा करें जो वाकई में ज़रूरतमंद हों.

२. My mother always fears something and also in tension, how can I help my mom. Please advise me. Tanveer, Kanpur

मन जब फ्यूचर में ज्यादा रहता है तो डर और चिंता आती है. लविंग वातावरण से डर और इन्सिक्योरिटी की फीलिंग कम हो जाती है. उनको अपने पसंद की एक्टिविटी में बिज़ी रखें ताकि उनका मन अधिक से अधिक वर्तमान में रहे– जैसे वे कोई क्लास ज्वाइन कर सकती हैं, स्वयं छोटे बच्चों को पढ़ा सकती हैं, या और कोई सेवा का काम ले सकती हैं. प्राणायाम, योग, ध्यान और सुदर्शन क्रिया से पोसिटिव लाइफ़ फ़ोर्स बढ़ता है जिससे टेंशन और डर खत्म हो जाता है.  

३.मैं ऑफिस में अक्सर देर तक काम करता हूँ, मेरे दोस्त मुझे workaholic कहतें हैं. मैं नहीं जानता कि मैं workaholic हूँ. क्या इससे मुझे नुकसान हो सकता है?
रवि, आगरा

बिना परिणाम की चिंता करे हुए अगर आप अपना हण्ड्रेड परसेंट देकर पूरे दिल से काम कर रहे हैं तो उसे कर्म योग कहा जाता है. बस आप अपने हार्ड वर्क को स्मार्ट वर्क में बदल दीजिए. गीता में कहा गया है "योगः कर्मसु कौशलं॥" – योग हमारे काम में कुशलता लाता है. एक गाड़ी को चलाने के लिए एक्सेलेरेटर और ब्रेक दोनों चाहिये. काम के साथ-साथ आपके जीवन के रिश्ते, आपकी होबीज़, आपकी स्पिरिचुअल बढ़त भी ज़रूरी है. हमें बैलेंस्ड होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पर ध्यान देना होगा.

11-Oct-2011


मुझे छोटे-छोटे काम भी पूछकर करने की आदत है. मैं घर में, ऑफिस में यहाँ तक कि travel करते वक्त अनजाने लोगों से भी advise लेने लगता हूँ. कई बार लगता है कि बिना advise लिए भी काम  हो सकता है. मेरी ये आदत क्या मेरे अंदर inconfidence को दिखाती है?
राजीव, पटना
हम सभी के अंदर एक अनोखी इंस्टिंक्ट है जो हमेशा हमें सही रस्ते चलने के लिए गाइड करती रहती है. जानवर तक अपना बचाव इसी इंस्टिंक्ट के आधार पर कर लेते हैं. आपने देखा होगा कि जब कभी भी हम कुछ गलत करते हैं तो उससे पहले हमारे अंदर एक आवाज़ आती है जो उसे न करने के लिए कहती है. गलत फैसले तभी होते हैं जब हम उसे अनसुना कर देते हैं. ज्यादा अनुभवी लोगों की advise लेना अच्छा है, पर सभी advise को सुनकर वही करिये जो आपकी अंदर की आवाज़ बोले. प्रयोग के लिए एक दिन आप मौन रहिये, ज़रूरत पड़ने पर ही बोलिए.

ऐसा नहीं कि मैं लोगों की परवाह नहीं करती लेकिन लेकिन छोटी-छोटी चीजों को लेकर केयर करना और दिखावे के लिए मीठी-मीठी बातें करना मेरी आदत नहीं है. लोग इससे बहुत नाराज रहतें हैं. क्या ये मेरा rude behavior है?
पल्लवी, वाराणसी
मन से, बोली से, और एक्शन से – हमें तीनों स्तरों पर परफेक्ट होना चाहिए. किसी एक में भी अगर कमी है तो वह कम्प्लीट नहीं है. अधिकतर लोग अपने को मन से केयरिंग मानते हैं. पर जब तक केयर को एक्शन से express नहीं करा जाये तो वह पर्याप्त नहीं है. और केवल मीठी बोली से केयर जताया जाये, और मन में कुछ और हो तो भी वह ठीक नहीं है. आप को ऐसे लोग ज्यादा पसंद होंगे जो अच्छी भावना रखते हों, मीठी बोली भी, और हेल्प भी करें. आप भी वैसा बनिए.    

मैं ऐसे लोगों कि बिलकुल हेल्प नहीं करना चाहता जो दूसरों की हेल्प नहीं करते. क्या मैं सही हूँ? आपकी क्या राय है?
संजय, जमशेदपुर
क्या आप किसी अपाहिज की हेल्प नहीं करना चाहेंगे? सच्ची हेल्प वही होती है जिसके बदले में कुछ भी पाने की अपेक्षा नहीं रखी जाए. मदद करने का जो भी मौक़ा मिले उसे उठा लेना चाहिए. हाँ कुछ लोगों को हाथ फैलाने की आदत होती है – ऐसों को हेल्प करने का तरीका अलग किया जा सकता है ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें जैसे उनसे कोई काम करवाना.

20-Sep-2011


मुझे यूनिवर्सिटी में आये हुए २ महीने हो गए, मेरा कोई दोस्त नहीं है. मैं दूसरों से बहुत घुल मिल नहीं पाता हूँ. दूसरे मेरे पास आते हैं तो मैं बहुतconscious हो जाता हूँ. मुझे लगता है कि वो अपने फायदे के लिए आये हैं. अब मैं अकेलापन feel करता हूँ. मैं क्या करूँ?
राकेश वर्मा, पटना
अक्सर दोस्ती आपसी फायदे के लिए ही शुरू होती है. कोई सामान्य समस्या, सामान्य पसंद, सामान्य कार्यक्षेत्र, सामान्य लक्ष्य या लंबी जान-पहचान दो लोगों को दोस्त बना देती है. जब दोस्ताना स्वभाव से दोस्त बनते हैं जिसके पीछे कोई कारण न हो तो ऐसी दोस्ती लंबी चलती है. अपने अकेलेपन से निकलने का एक उपाय है कि आप दूसरों को खुशी खुशी फायदा देने के लिए तैयार हो जाइए. आप यदि किसी के लिए उपयोगी बन सके तो आप अपने को लकी मानिए.    

मैं पूजा-पाठ बहुत करता हूँ. एक दिन भी मिस कर देता हूँ तो लगता है कि कुछ भूल रहा हूँ. मेरे एक दोस्त ने मुझे समझाया कि  इतना ज्यादा पूजा पाठ ठीक नहीं है. मुझे भी लगता है मेरे पूजा पाठ से घर में लोगों को परेशानी होती है पर कोई कुछ कहता नहीं. क्या मुझे पूजा पाठ थोड़ी कम करनी चाहिए?                                                                                                                               तन्मय जैसवाल, बरेली
हमें अपने साधना के तरीके को choose  करने की पूरी आज़ादी है. आपकी बातों से ज़ाहिर है कि आप अपनी पूजा-पाठ को इंज्वॉय करते हैं  - तब आप बस अपने आत्मा या अपने गुरु की बात को मानिए और किसी दूसरे की राय लेने की ज़रूरत नहीं है. पूजा को बड़े प्रेम के साथ करिये – इस डर के साथ नहीं कि यदि आप पूजा कुछ कम कर देंगे तो कुछ बिगड़ जायेगा. ध्यान रखें कि आप की पूजा पाठ से औरों को कम से कम परेशानी हो – जैसे शोर कम करें, समय का ध्यान रखें और अपनी सभी जिम्मेदारियों को पूरी तरह से निभाएं.

मैं businessman हूँ और रोजाना busy रहता हूँ, न तो family को वक्त दे पाता हूँ और न ही खुद के लिए वक्त निकाल पाता हूँ. कभी सोचता हूँ किbusiness grow करेगा तो फॅमिली के लिए ही होगा, फिर लगता है कि फॅमिली के साथ एक लंबा ब्रेक लेना ही चाहिए. मैं confused हो गया हूँ किimportant क्या है.
पंकज तिवारी,  मेरठ
बैलेंस रखना ज़रूरी है. आपको फॅमिली, बिज़नस, हॉबीज़, और आध्यात्मिक विकास चारों पर ध्यान देना होगा तब ही आप संतुष्ट रहेंगे. किसी एक में भी ध्यान कम देने पर अंदर से बेचैनी महसूस होती है.

  
मैं सोचता बहुत हूँ. अक्सर लोग कहतें हैं कि मैं खोया खोया रहता हूँ. मैं भी realize करता हूँ कि काम के बीच अक्सर ही मेरा mind divert हो जाता हैं और मैं दूसरी बातों में खो जाता हूँ. रस्ते में चलते वक्त भी मैं सोचता रहता हूँ. इस आदत से छुटकारा कैसे मिलेगा.
प्रदीप शर्मा, गोरखपुर
हमारे मन भूतकाल या भविष्य के बीच में डोलता रहता है. जब मन भूतकाल में होता है तो ऐसी बातों को ज्यादा याद करता है जो गडबड़ हुईं और जब मन भविष्य में जाता है तो हमारे अंदर डर या चिंता आ जाती है. हमारे सबसे अधिक खुशी के पल वह रहे जिसमें मन वर्तमान क्षण में था. साँसों की एक विशेष प्रक्रिया है जिसे सुदर्शन क्रिया कहते हैं जिसे सीख कर मन के इस स्वभाव से छुटकारा मिल सकता है. 

13-Sep-2011


मेरे दोस्तों का मानना है कि मैं खुशमिजाज nature का हूँ, मुझे भी लगता है कि मैं परेशान कम होता हूँ लेकिन बीते दिनों IAS pre में मैं सेलेक्ट नहीं हो पाया जबकि मुझे पूरी उम्मीद थी. मैं बहुत उदास रहने लगा हूँ, Study में भी मेरा मन नहीं लग रहा है. मैं क्या करूँ?
प्रीतम,  अलाहाबाद
I have answered many questions related to failure in entrance exams/studies in the past, please choose questions with more diversified topics else won’t this column become repetitive?
जब हम खुश और relaxed रहते हैं तो अक्सर focus नहीं कर पाते हैं, और जब हमें concentrate करना होता है – जैसे exam से पहले तब हम टेंशन फ्री नहीं हो पाते. जब हम sports खेलते हैं तब हम फ़ोकस्ड और रिलैक्सड दोनों हो सकते हैं. आपको भी अपने कैरियर के लिए ऐसी ही मनोस्थिति बनानी होगी. आपके जैसे कई युवाओं को सुदर्शन क्रिया से भी बहुत लाभ मिला है. आपकी जितनी capacity है उसका पूरा इस्तेमाल करिये – कर्म पर हमारा पूरा अधिकार है, फल पर नहीं.   

मैं सबको हंसाने और खुश करने की कोशिश करता रहता हूँ, लेकिन कई बार लोगों से ऐसा response मिलता है कि मैं अंदर से टूट जाता हूँ. जब मैं सबसे अच्छा behave करता हूँ तो लोग मुझसे बुरा behave क्यों करते हैं?
मयंक सोनी, पटना
वे बेचारे खुद स्ट्रेस्ड हैं – उन के प्रति दया रखिये. एक हँसमुख व्यक्ति को तो कोई अपमानित कर ही नहीं सकता – वह स्वभाव ही उसकी ढाल है. हँसना-हँसाना बहुत अच्छा गुण है जो लोगों को जोड़ता है और डर और चिंता को मिटाता है. हाँ मजाक की अति भी अच्छी नहीं लगती- उसे सही जगह और समय पर करना चाहिए. मजाक के साथ ज्ञान हो और लोगों का ख्याल भी रहे तब वह छिछला नहीं लगता है. यदि आप मुस्कुराते हुए अपनी सभी जिम्मेदारियों को भी पूरी तरह से निभा रहे हैं – तब आपके हँसी मजाक को लोग बेहतर ले पायेंगे.

मैं लाख कोशिश करूँ लेकिन दूसरों का मजाक बनाने से मैं खुद को रोक नहीं पाता. कई लोग मुझसे नाराज़ हो जाते है. मैं खुद को कण्ट्रोल कैसे करूँ?
राकेश सचान,कानपूर
शब्दों का उद्देश्य शान्ति बनाना है. आप यह जज कर लीजिए कि आपका मज़ाक कहीं अपमान तो नहीं है? अपमान रिश्ते तोडता है जबकि मज़ाक लोगों को जोड़ता है. मज़ाक से माहौल को हल्का बनाइये और साथ ही यदि आप caring और  concerned फ़ील करेंगे और sensitivity रखेंगे तो लोग नाराज़ नहीं होंगे. आप साथ में अपना भी मज़ाक बनाया करिये.

जब मैं किसी से बेहतर होता हूँ तो बहुत अच्छा feel करता हूँ लेकिन ज्यों ही मेरी मुलाकात किसी genius से होती है मैं खुद को कमजोर समझने लगता हूँ और disturb हो जाता हूँ. मैं बैलेंस रहना चाहता हूँ, कोई solution?
विवेक, देहरादून
अपने को औरों से बेहतर समझना या तुच्छ समझना दोनों ही अहंकार के रूप हैं. इसका उपाय सभी के साथ अपनेपन की सहज भावना रखना है. माँ-बाप अपने बच्चे को मेडल पाता देख खुद गर्व महसूस करते हैं – उससे जलते नहीं. बगीचे का हर फूल perfect है – वैसे ही आप-हम सभी अपनी जगह perfect हैं. लता मंगेशकर जी की आवाज़ को सुनकर हम अपने को कमज़ोर नहीं समझते बल्कि ईश्वर द्वारा मिली उनकी प्रतिभा को हम इंज्वॉय करते हैं. दूसरों को सराहना एक दिव्य गुण है.

06-Sep-2011


प्रश्न : कई बार मुझे लगता है कि मैं गलत हूँ फिर भी न मैं गलती accept कर पाता हूँ और न ही sorry  कह पाता हूँ, उल्टा गुस्सा करने लगता हूँ, बाद में guilt भी feel करता हूँ. ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है. मुझे लगता है कि मैं sorry कह पाता तो हल्का feel करता. कोई solution है?
-अमलेन्दु त्रिपाठी, रांची
उत्तर: आपके लिए relationship ज्यादा important है कि अपने आप को सही साबित करना. एक साधारण से Sorry शब्द से कड़वाहट, गुस्सा, नफरत और दूरियां मिट सकती हैं. गलती को सिर्फ एक होनी की तरह देखें जो अनजाने में होती है  – अगर गलती के साथ “तुम्हारी गलती” जोड़ा तो उससे गुस्सा आता है और अगर “मेरी गलती” जोड़ा तो उससे guilty feeling आती है. फिर भी उस गलती से जिन लोगों को चोट पहुँची हो उनके मन को संभालने का दायित्व आपका है.


प्रश्न : मैं 12th में पढ़ती हूँ और डॉक्टर बनना चाहती हूँ, मेरी preparation भी अच्छी हो रही है फिर भी अपने future को लेकर बहुत डरती रहती हूँ. कभी-कभी लगता है कि मैं कुछ भी नहीं कर पाऊँगी. वहीँ दूसरे जो मुझसे पढ़ने में भी weaहै वो मुझसे ज्यादा खुश रहते हैं. मैं  positive कैसे feelकरूँ? 
- अर्पिता श्रीवास्तव,
उत्तर: डर का उपाय प्रेम है. अपने subject से प्रेम करिये. विषय में रूचि रखने से हमारी knowledge बढ़ती है  - और अगर आपके concepts clearहैं तो आजीविका की चिंता नहीं करनी है क्योंकि वह अपनेआप ही आपको मिल जायेगी. अपने से दस साल सीनियरों के जीवन को आज देखिये - वे सभी settled होंगे – आप भी हो जायेंगी.   

प्रश्न : मैं PG कर रहा हूँ, और मेरी प्रॉब्लम ये है कि मैं न चाहते हुए भी बहुत ज्यादा बोलता हूँ. दूसरों को advise देने लगता हूँ. उस वक्त मुझे लगता है कि मैं बहुत ज्यादा बोल रहा हूँ, पर न जाने क्यों मैं अपने आप पर कण्ट्रोल नहीं कर पाता हूँ. मुझे क्या करना चाहिये?
-अजीत तिवारी, गोरखपुर
उत्तर: Observe ज्यादा करें, बातें कम इतनी सलाह नहीं दें कि दूसरा उसको हजम नहीं कर पाए.  देखें कि दूसरा व्यक्ति उनको ले भी रहा है कि नहीं. आप दूसरों से प्रश्न पूछिए – उनकी पसंद नापसंद को जानिये, उनकी प्रोब्लेम्स और उनके अलग-अलग विकल्प उन्हीं से पूछिए, और हरेक हल के फायदे-नुक्सान को उनसे समझ कर फिर अपनी सलाह दीजिए. इससे आपका संवाद बेहतर होगा. याद रखिये कि आप सलाह उनकी मदद के लिए दे रहे हैं और बदले में आप को कुछ भी नहीं चाहिए – उनका स्वीकार भी नहीं.

23-Aug-2011


मेरे दोस्तों का कहना है कि मैं दूसरों की बातों से बहुत जल्दी impress हो जाता हूँ, कई बार मुझे भी यह realize होता है. मुझे कई बार इसका नुकसान भी उठाना पड़ता है. मुझे इससे कैसे बचना चाहिए?
अनूप पाण्डेय, बरेली
दूसरों के अंदर अच्छाई देखना तो पौसिटिव गुण है. बिना ट्रस्ट के हम इस संसार में एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकते. जीवन को सुखी बनाने के लिए ट्रस्ट रखना ज़रूरी होता है. हाँ दूसरों की बातों में हम बह न जाएँ - इसके लिए ज़रूरी है आत्म-विश्वास. आप को अपने आप से भी impress होना चाहिए. दूसरा हमारी इच्छाएं हमको कमज़ोर कर देती हैं जिससे हम औरों की बातों में फँस सकते हैं. हमें जो कुछ भी मिला है उससे यदि हम तृप्त हो जाएँ तो कोई भी आपको हिला नहीं सकता है.   

मैं अपना कोई भी काम सही से manage नहीं कर पाता जब वक्त निकल जाता है तो irritate हो जाता हूँ. रोज प्लान बनाता हूँ पर divert होकर इधर-उधर के कामों में उलझ जाता हूँ. यहाँ तक कि मैं अपना week-off भी planning के मुताबिक एन्जॉय नहीं कर पता. क्या ये concentration प्रॉब्लम है? हाँ, तो solution क्या है?
दिलीप बरनवाल, कानपुर
जब तक आपके अंदर उस काम को करने के लिए दिल से चाह नहीं जगेगी या काम नहीं होने का डर नहीं होगा तब तक आप ढीले पड़ सकते हैं. आपने जो प्लैन बनाया हो उसको लिख लें. अपने डेस्क पर प्लैंन को चिपका लीजिए या अपने मोबाइल में अलार्म भी सेट कर सकते हैं. किसी और के साथ अपने प्लैन को शेयर करने से उसके प्रति हम अधिक सिंसेयर हो जाते हैं – उस व्यक्ति को आप रिमाइंडर देने के लिए कह सकते हैं. रोज सवेरे कुछ देर ध्यान करिये.

मैं न चाहते भी चीजों पर react बहुत जल्दी करता हूँ. खुच लोग मुझे suggest करतें है कि मुझे reaction less होना चाहिए, पर कोई reaction lessकैसे हो सकता है. ये possible है?
रंदेप सिंह, पटना
Act करिये  - React नहीं. Reaction हम बिना होश के करते हैं जिससे हम गलत फैसले ले लेते हैं. हमें अपनी परिस्थिति को और लोगों को पहले स्वीकार करना पड़ेगा. स्वीकार करने के बाद फिर जब हम सोच समझ कर निर्णय लेते हैं तो वे अधिक प्रभावशाली होते हैं. स्वीकार के साथ यदि आप क्रोध का दिखावा भी करें तो भी ठीक है – जैसे किसी छोटे बच्चे को आप माचिस के साथ खेलने के लिए डाटते हैं.

09-Aug-2011


इमोशनल होना अच्छा है या बुरा? मैं फिल्म देखते वक्त या कोई बुक पढते वक्त अक्सर इमोशनल  हो जाता हूँ. कई बार आँखों से पानी भी आ जाता है. क्या मुझे इस पर कंट्रोल करना चाहिए? अगर हाँ तो कैसे?
अर्जुन सिंह पटना
न ही हम इतना इमोशनल हो जाएँ कि कमज़ोर हो जाएँ और न ही इतने स्ट्रोंग रहे कि इनसेंसिटिव हो जाएँ. ज्ञान के पथ में इमोशनल नेचर हमारी ताकत बन सकता है – उससे ज्यादा इंट्यूशन, दया, प्रेम, धीरज, सहनशीलता, आत्म-विश्वास, गैर प्रतिक्रयाशील शांत स्वभाव आ सकता है. भावनाओं को कंट्रोल करने के लिए सुदर्शन क्रिया सबसे अच्छा उपाय है. अलग अलग इमोशन में हमारी साँसों की लय अलग-अलग हो जाती है. सुदर्शन क्रिया में इसका ठीक उलटा किया जाता है जिसमें अलग-अलग साँसों की लय के द्वारा अंदर की भावनाएँ बदल जाती हैं.  

हम अपनी सेहत के लिए हेल्थ फ़ूड खाते हैं, डाईट चार्ट फौलो करते हैं. आत्मा की सेहत के लिए हमें क्या करना चाहिए? क्या इसके लिए भी प्लानिंग करी जा सकती है.
तरुण वर्मा जमशेदपुर
सोल भूखी है मेडिटेशन के लिए. उसी से उसको राहत मिलती है –कई निर्देशित ध्यान यूट्यूब में या उनकी सीडी बाज़ार में उपलब्ध हैं जिनके साथ आप ध्यान कर सकते हैं. प्रेम, सेवा, आनंद और उत्साह से आत्मा की सिचाई होती है.
      
जब मेरे साथ सब कुछ बुरा हो रहा है ऐसे में मैं पोसिटिव कैसे सोच सकता हूँ? १२थ के एक्साम में मेरे नंबर कम आये, मुझे अच्छे कॉलेज में अड्मिशन भी नहीं मिल पाया. लोग मुझसे ठीक से बात भी नहीं करते. मैं बिलकुल पोसिटिव नहीं हो पा रहा हूँ.
सुनील कुशवाहा
बीती बातों की गलतियों पर पछतावा न करते हुए, भविष्य का एक लक्ष्य रखते हुए अपने वर्तमान को अपना १००% अट्टेंशन दीजिए. यह समय है एक्शन लेने का. हो सकता है कि अच्छे कालेज में आपको दाखिला नहीं मिला पर अब जिस कालेज में है उसके आप सबसे अच्छे छात्र बन सकते हैं. कालेज में जिम्मेदारी उठाने का छोटे से छोटा मौक़ा लीजिए, जैसे आप किसी कल्चरल इवेंट को ओर्गानाइज़ कर सकते हैं. जितनी ज्यादा जिम्मेदारियां आप निभाएंगे उतनी ही ज्यादा आप की क्षमता बढ़ेगी और आप पौज़िटिव रह सकेंगे.