Tuesday, June 28, 2011

7-Jun-2011


Q:मै करना बहुत कुछ चाहता हूँ, पूरे जोश से उसे शुरू भी करता हूँ लेकिन रस्ते में ही मुझे लगने लगता है की मै ये नहीं कर पाउँगा . शायद मेरा confidence low है . क्या ये डर स्वाभाविक है ?
-राजीव यादव , मेरठ

A:कार्य को सफलता पूर्वक करने के लिए ज्ञान शक्ति, इच्छा शक्ति और क्रिया शक्ति तीनों ही आवश्यक है. अपने लक्ष्य को हमें मन में बिलकुल स्पष्ट रखना चाहिए. यह संकल्पमय सृष्टि है – हमारा दृढ संकल्प ही कार्य सिद्ध कराता है. कार्य को पूर्ण करने के लिए केवल कड़ी मेहनत पर्याप्त नहीं, बल्कि ऐसी युक्तिपूर्ण योजना की भी आवश्यकता है जो सभी छोटे-बड़े पहलुओं को ध्यान में रख कर बनायी जाए. और फिर आवश्यक है हमारे १००% एकाग्रचित् होकर कार्य करने की. हम शरीर से इतना नहीं थकते जितना भटकते हुए मन से. प्राण ऊर्जा के स्तर में कमी से आत्मसंशय आना स्वाभाविक है जो प्राणायाम एवं ध्यान से ठीक हो जाता है. ऐसे में भक्ति सहायक होती है - यह विश्वास कि ईश्वर और पूरी प्रकृति आप की मदद कर रही है. प्रयोग के लिए कोइ भी सेवा का कार्य लीजिए – आप अवश्य उसे पूरा कर ले जायेंगे.

Q:मेरा बचपन बहुत struggle में बीता है . अब मैं working हूँ . मगर पता नहीं क्यों बीते वक्त के shadow मेरा पीछा नहीं छोड़ते . मैं आने वाले कल को लेकर डरा रहता हूँ . कभी कभी लगता है की मेरी किस्मत ही ख़राब है इसलिए कुछ अच्छा भी है तो वो आगे ख़राब हो जाएगा . मुझे पता है ये गलत है लेकिन मै इस पर control नहीं कर पता . मगर इसका असर मेरी पूरी personality पर पड़ने लगा है .
-सोनू वर्मा , पटना

A:पीछे पलट कर देखते हुए आगे चलेंगे तो टक्कर हो जायेगी. चिंता करके हमें मिल क्या रहा है? हमें किस चीज़ का भय है? एक दिन तो सबको मिट्टी में मिलना ही है न. हम उनको देखें जिनकी हालत हमसे भी अधिक खराब है – कम से कम हमारे पास खाने को रोटी है, सर के ऊपर छत है और शरीर चल रहा है. हर बुरी परिस्थिति हमको कुछ सीख दे जाती है. हमारे दुःख ही हमारे सुखों को उभारते हैं. नायक तभी चमकता है जब खलनायक भी तगड़ा हो. अभी भूतकाल और भविष्य दोनों को ही छोड़कर अपने वर्तमान को पूर्ण रूप से मुस्कुराते हुए जियें.

Q:मुझे बार -बार गुस्सा अत है . Control करने की कोशिश करता हूँ तो और भी ज्यादा आता है . क्या ये natural है ? खुद को शांत करने का कोई उपाय है ?
-पंकज सिंह , कानपूर

A:सब कुछ सही ढंग से होने की चाह हमारे अंदर गुस्सा ले आती है. गुस्सा आपसे पहले अनुमति लेकर नहीं आता. आ गया तो कोई बात नहीं. वैसे भी गुस्सा हमेशा भूतकाल की किसी घटना से सम्बन्धित है जिसका अभी कोई मायने ही नहीं है. गुस्से में हमारी लय बिगड़ जाती है – तो एक तरीका है इसको समाप्त करने का – गाना गाइए, लय के साथ गुस्सा टिक ही नहीं सकता. या फिर हुंकार भरिये, गिनती गिनिये, साँसों पर ध्यान दीजिए. याद करिये कि पहले जब भी आपने गुस्सा किया उससे हमारा काम बना या बिगड़ा? हाँ, कभी-कभी सीख देने के लिए बिना गुस्सा हुए गुस्से का प्रदर्शन करना आवश्यक होता है.

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1 Comments:

At June 30, 2011 at 5:54 PM , Blogger Pramod Narain said...

keep up the good work "Child the Father of man"!

 

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